प्रस्तावना

प्रस्तावना

पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र संवेदनशील हैं। इन पर मृदा-क्षरण, भू-स्खलन तथा जेनेटिक विविधता की हानि का असर पड़ता है। भौतिक रूप से कटे रहने के कारण पर्वतीय क्षेत्र एवं उनकी आबादी राजनीतिक और आर्थिक विकास से महरूम हो जाती है। पहाड़ी लोग बेरोजगारी, गरीबी, खराब सेहत तथा अपर्याप्त साफ-सफाई से ग्रस्त रहते हैं। आम लोकमत के विपरीत हालांकि कुछ पर्वतीय क्षेत्रों ने तेजी से अपना आर्थिक स्तर सुधारकर अपने पर्यावरण, जैव-विविधता तथा सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखा है। यह पर्वतीय पारिस्थिकीय प्रणाली में विकास के नियोजित प्रयासों और संरक्षण के प्रति विकासकर्ताओं की संवेदनशीलता के कारण घटित हुआ है। इस क्रियाशील प्रणाली के लिए एक विकासोन्मुखी एवं लचीले नीतिपरक ढांचे की जरूरत है जिसमें निगरानी तथा समीक्षा और जहां जरूरी हो, पुनरीक्षण के लिए एक अन्तर्निहित प्रणाली होनी चाहिए। सतत विकास के पीछे मुख्य सोच मानव कल्याण को बढावा देना है इसकी आवृति भारत की विकासोन्मुख नीति में होती रहती है।

इसको मूर्तरूप प्रदान करने के लिए देश की आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय जरुरतों के बीज संतुलन एवं तारतम्य बिठाने की आवश्यकता है। पर्यावरण संबंधी कई महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों में भारत भी महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है। भारत कई मुख्य बहु-पक्षीय करारों में शामिल है और यह कई पर्यावरणीय समस्याओं की अंतनिर्भरता तथा सीमापारीय प्रकृति को समझाता है। राष्ट्रीय पर्यावरणीय नीति भी अंतर्राष्ट्रीय प्रयत्नों में सकारात्मक योगदान देने की भारतीय मंशा द्योतक है।

एसजेवीएन की पर्यावरण नीति संविधान के अनुच्छेद 48ए तथा 51ए(जी) में उल्लिखित तथा अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या द्वारा सशक्तीकृत स्वच्छ पर्यावरण की अवधारणा के प्रति हमारी संकल्पबद्धता की सूचक है। यह मान्यता है कि पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखना सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक की जिम्मेवारी है। देश के पर्यावरणीय प्रबंध के समग्र भीगीरथी कार्य में सभी को प्रतिभागी की भीवना से ओत-प्रोत होना चाहिए। सरकार द्वारा अपने प्रयासों को तो अनिवार्यत: तेज किया जाना चाहिए। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति और संस्था द्वारा पर्यावरण की गुणवत्ता के उन्नयन के प्रति अपने-अपने दायित्व को समझा जाना चाहिए।

एसजेवीएन अपनी परियोजनाओं में पर्यावरण एवं सामाजिक मुद्दों के हल के प्रति अपने दृष्टिकोण और समर्पण के जरिए कटिबद्ध है और इनके हल के लिए प्रबंधन प्रविधियां निर्धारित की गई हैं। इनमें संगठनात्मक तथा परियोजना स्तर पर पर्यावरणीय एवं सामाजिक मसलों की पहचान, मूल्यांकन तथा प्रबंधन के लिए ढांचा शामिल है।

एसजेवीएनएल का विश्वास है कि इसकी पर्यावरणीय नीति एक कार्यशील एवं जीवंत दस्तावेज है, जिसका देश की सामाजिकक एवं पर्यावरणीय क्रियान्वयन में हुए बदलावों के परिप्रेक्षय में उन्नयन किया जाएगा और परियोजनाओं के निष्पादन के दौरान हासिल अनुभवों के मद्देनजर इसे अशोधित किया जाएगा। यह कार्पोरेट कामकाज को एक मानवीय चेहरा प्रदान करती है और कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को लागत लाभ के पुराने नजरिए से न देखकर पर्यावरणीय एवं सामाजिक पक्षों पर मुख्य रूप से ध्यान देती है। एसजेवीएन की सतत विकास के प्रति पक्की वचनबद्धता और संवेदन की द्योतक है।

जलविद्युत परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव

  • भूमि पर प्रभाव
  • वायु पर प्रभाव
  • जल पर प्रभाव
  • वनस्पति पर प्रभाव
  • वन्यजीवन पर प्रभाव
  • शोर का प्रभाव
  • आर्थिक-सामाजिक प्रभाव

निम्नलिखित प्रावधानों के अनुसार दुष्प्रभाव दूर करने के लिए पर्यावरणीय प्रबंधन योजना:

  • प्रतिपूरक वन्यरोपण
  • हरित पट्टी विकास
  • निर्माण क्षेत्रों की लैण्ड स्केपिंग
  • कचरा प्रबंधन स्थलों का पुनरूद्धार
  • मत्स्य प्रबंधन एवं विकास
  • कैट योजना
  • जैव-विविधता प्रबंधन योजना
  • नियंत्रित नदी प्रवाह
  • पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना
  • अंगीकार्यात्मक क्षमता विकास
  • आपातकालीन तैयारी योजना
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